पाक सेना बड़ी लड़ाई नहीं चाहती, इसलिए शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा

इस्लामाबाद/दिल्ली.  पाकिस्तान में बुधवार को सबसे ज्यादा हलचल इस्लामाबाद के रेड जोन एरिया और मुजफ्फराबाद आर्मी सेंटर में थी। रेड जोन एरिया में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का ऑफिस कंस्टीट्यूशन एवेन्यु है। यहां सुबह 8:30 बजे से सैन्य अफसरों और मंत्रियों के आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया था। यहां मंगलवार से भी ज्यादा हलचल थी, जब भारतीय एयरफोर्स ने बालाकोट पर हमला किया था।

आवाजाही के बीच विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को छोड़कर बाकी किसी की गाड़ी ज्यादा देर नहीं रुकी। वहीं, मुजफ्फराबाद आर्मी सेंटर में हलचल का कारण पाकिस्तान द्वारा भारतीय एयरफोर्स के पायलट अभिनंदन को यहां रखना था। बाद में यहीं के आर्मी अस्पताल में उनका उपचार हुआ। पाकिस्तान इस तैयारी में है कि इमरान खान ने भारत के सामने शांति वार्ता का जो प्रस्ताव रखा है, अगर भारत उसे मानता है तो अभिनंदन को छोड़ दिया जाएगा, ताकि उसकी छवि सुधरे।

इमरान ने शांति वार्ता का प्रस्ताव दिया

दरअसल, इमरान ने ही अभिनंदन को सुरक्षित रखने और शांति वार्ता का प्रस्ताव दिया है। इसकी दो वजह हैं। पहली, इमरान खान की विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से हुई लंबी बैठक और दूसरी वहां के आर्मी चीफ द्वारा सेना के लो स्केल वॉर से आगे के लिए तैयार न होना।

किसी देश ने खुलकर समर्थन नहीं किया

मंगलवार को हुई सिक्युरिटी काउंसिल की मीटिंग से पहले पाक पीएम ने विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को दूसरे देशों के विदेश मंत्रियों से बात करने को कहा था, ताकि पता चले कि युद्ध की स्थिति में कौन-कौन साथ खड़ा है। इस बातचीत में कुरैशी को किसी देश ने खुलकर सहयोग नहीं करने की बात कही। चीन ने भी खुलकर सहयोग से मना कर दिया। अमेरिका ने भी सख्ती ही दिखाई।

सारा अपडेट विदेश मंत्री ने एनएसी मीटिंग से पहले इमरान को दिया। इन सबके बीच बुधवार को हुई नेशनल कमांड अथॉरिटी (एनसीए) की मीटिंग में सेना प्रमुख बाजवा ने हाई लेवल वॉर टालने की अपील की। इसी मीटिंग में पाकिस्तान की तरफ से शांति प्रस्ताव रखने का फैसला हुआ। इसको लेकर भारत से संपर्क साधने और बाकी देशों को इस बारे में बताने की जिम्मेदारी भी शाह को दी गई है। इसी को देखते हुए शाह ने जापान सहित अपने 3 विदेश दौरे कैंसिल कर दिए हैं। करीब 10 साल बाद ऐसा हुआ है जब एनएसी की मीटिंग रिव्यू से आगे बढ़कर किसी खास मकसद के लिए बुलाया गई।

द्वीप काे लेकर विवाद 200 साल से भी पुराना
दोकोदो द्वीप पर दक्षिण कोरिया और जापान अपना हक जताते हैं। दक्षिण कोरिया दावा करता है कि द्वीप 17वीं सदी से उसका अंग है, वहीं जापान इसे अपने लोगों का हिस्सा बताता है। दक्षिण कोरिया के करीब होने के बावजूद विवाद के चलते यहां सिर्फ पर्यटक पहुंच पाते हैं। हालांकि, ज्वालामुखी की वजह से वह भी ज्यादा दिन यहां नहीं ठहर पाते।

खराब मौसम में बाहरी दुनिया से संपर्क कट जाता है
किम सिन-योल पहली बार 1991 में अपने पति के साथ इस द्वीप पर आई थीं। प्राकृतिक गैसों और खनिजों से भरे होने के बावजूद बुनियादी जरूरतों की कमी के कारण तब यहां रहना काफी मुश्किल था। खराब मौसम के दौरान तो कई बार द्वीप महीनों के लिए पास के शहर से कट जाता था, लेकिन फ्री डाइविंग में महारत हासिल होने की वजह से उन्हें यहां रहने में कभी दिक्कत नहीं आई। किम के मुताबिक, कई बार उन्होंने सिर्फ मछलियां खाकर ही कई हफ्ते गुजारे।

इन दिक्कतों के बावजूद किम ने द्वीप पर रहने की ठानी और लंबे समय तक बिना किसी मदद के यहां की इकलौती रहवासी बनीं। पिछले साल पति के निधन के बावजूद भी किम इस द्वीप को नहीं छोड़ना चाहतीं। पुलिसकर्मी और लाइटहाउस ऑपरेटर कुछ दिनों के लिए यहां आने के बाद मुश्किल परिस्थितियां देख कर लौट जाते हैं, लेकिन किम बढ़ती उम्र में भी कोरियाई मेनलैंड लौटना नहीं चाहतीं।

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